कृष्ण यहाँ योग की दो अवस्थाएँ बताते हैं। जब कोई साधक योग की ओर चलना शुरू करे — तब उसके लिए कर्म ही साधन है। यानी काम करते रहो, निष्काम भाव से। यह पहली सीढ़ी है।
जब वही साधक योग में पूरी तरह स्थिर हो जाए — तब शम अर्थात् मन की शांति उसका साधन बन जाती है। यह जैसे पहाड़ पर चढ़ने के लिए पैर चाहिए, पर चोटी पर पहुँच जाओ तो बस ठहरना होता है।