📿 श्लोक संग्रह

यं संन्यासमिति

गीता 6.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥
यम् संन्यासम्
जिसे संन्यास कहते हैं
इति प्राहुः
ऐसा जानते हैं लोग
योगम् तम् विद्धि
उसे योग जानो
पाण्डव
हे पाण्डुपुत्र (अर्जुन)
न हि
निश्चय ही नहीं
असंन्यस्तसङ्कल्पः
जिसने संकल्प न छोड़ा
योगी भवति
योगी नहीं बनता

कृष्ण अर्जुन को बताते हैं — हे पाण्डव, लोग जिसे संन्यास कहते हैं, उसे तुम योग समझो। दोनों में कोई फर्क नहीं। संन्यास का असली अर्थ है संकल्पों का त्याग — 'मुझे यह मिले, वह मिले' — ऐसी कामनाओं का छोड़ना।

जो व्यक्ति अभी भी मन में तरह-तरह के फल-संकल्प लिए बैठा है, वह भले ही गेरुए वस्त्र पहन ले — योगी नहीं बन सकता। योग भीतर से होता है, बाहर से नहीं।

यह 6.1 का विस्तार है। पहले श्लोक में कहा था कि फल-त्याग ही संन्यास और योग है — यहाँ उसकी पुष्टि होती है। संकल्प अर्थात् मन की इच्छाओं का जाल — इसे छोड़े बिना कोई भी साधना अधूरी रहती है।

भगवद्गीता में 'संकल्प' शब्द बार-बार आता है। कृष्ण का आशय है — इच्छाओं से मुक्त होना ही योग की पहली शर्त है।

अध्याय 6 · 2 / 47
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