इस श्लोक में भगवान कृष्ण बताते हैं कि उनका प्रिय भक्त कैसा होता है। सबसे पहली बात — वह किसी से द्वेष नहीं रखता। न किसी से जलन, न किसी से नफ़रत। सबसे मित्रता का भाव रखता है और सबके प्रति करुणा (दया) रखता है।
फिर कहा गया — वह न तो 'मेरा-मेरा' करता है और न 'मैं-मैं'। ममता और अहंकार — ये दो चीज़ें मनुष्य को सबसे ज़्यादा बाँधती हैं। जो इनसे मुक्त है, वह सहज हो जाता है, हल्का हो जाता है — जैसे बादल बरसकर हल्का हो जाता है।
सुख-दुःख में समान रहना और क्षमाशील होना — ये भक्त के सबसे व्यावहारिक गुण हैं। कोई ग़लती करे तो माफ़ कर देना, कोई दुःख आए तो विचलित न होना। जैसे दादा-दादी बच्चों की ग़लतियाँ माफ़ कर देते हैं — वैसा ही स्वभाव सच्चे भक्त का होता है।