📿 श्लोक संग्रह

सन्तुष्टः सततं योगी

गीता 12.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
सन्तुष्टः
संतुष्ट, तृप्त
सततम्
सदा, हर समय
योगी
योगी, साधक
यतात्मा
जिसने अपने को वश में किया है
दृढनिश्चयः
दृढ़ निश्चय वाला
मयि
मुझमें
अर्पितमनोबुद्धिः
मन और बुद्धि अर्पित किए हुए
यः
जो
मद्भक्तः
मेरा भक्त
सः
वह
मे प्रियः
मुझे प्रिय है

यह 12.13 के बाद भक्त-लक्षण श्रृंखला का अगला श्लोक है। कृष्ण यहाँ चार लक्षण बताते हैं — सदा संतुष्ट, आत्म-संयमी, दृढ़ निश्चय वाला, और मन-बुद्धि मुझे अर्पित किए हुए। ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।

सदा संतुष्ट का अर्थ है — जो मिला, उसमें खुश। जैसे एक बुज़ुर्ग दादी जो चाहे घर हो या झोपड़ी, भोजन मिले या कम — मन से तृप्त रहती हैं। दृढ़ निश्चय का अर्थ है — जो ठाना, उससे न हटना। इन दोनों का मेल जिसमें है, और जिसका मन-बुद्धि कृष्ण को अर्पित है — वह भक्त कृष्ण को अत्यंत प्रिय है।

यह श्लोक 12.13 के बाद आता है और भक्त-लक्षण श्रृंखला (12.13-19) का हिस्सा है। 12.13 में द्वेष-रहितता, मैत्री, करुणा जैसे लक्षण थे। 12.14 में संतोष, संयम और दृढ़ता के लक्षण आते हैं।

परंपरा में इन लक्षणों को सामूहिक रूप से 'भक्त की पहचान' माना जाता रहा है। ये श्लोक कृष्ण के प्रिय भक्त का चित्र बनाते हैं — यह कोई काल्पनिक आदर्श नहीं, बल्कि जीवन में उतारी जा सकने वाली विशेषताएँ हैं।

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