इस श्लोक में दो बातें हैं — एक दिशा से और दूसरी दिशा से। पहली — जिससे संसार नहीं घबराता। यानी यह भक्त किसी के लिए भय का कारण नहीं बनता। दूसरी — जो संसार से नहीं घबराता। यानी दुनिया की उठापटक उसे विचलित नहीं करती।
हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेग — ये चार चीज़ें मन को डाँवाडोल करती हैं। जो इनसे मुक्त है, वह शांत और स्थिर रहता है। जैसे पुरानी बड़ की जड़ें — तूफान में भी नहीं हिलती, पर पक्षियों को छाया और आश्रय देती हैं। ऐसा भक्त कृष्ण को प्रिय है।