📿 श्लोक संग्रह

अनपेक्षः शुचिर्दक्षः

गीता 12.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
अनपेक्षः शुचिर्दक्षः उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
अनपेक्षः
किसी से अपेक्षा न रखने वाला
शुचिः
शुद्ध, पवित्र
दक्षः
कुशल, चतुर
उदासीनः
तटस्थ, सब में समान
गतव्यथः
जिसकी व्याकुलता चली गई हो
सर्वारम्भपरित्यागी
सब नए उद्यमों का त्याग करने वाला
यः
जो
मद्भक्तः
मेरा भक्त
सः
वह
मे प्रियः
मुझे प्रिय है

यहाँ पाँच गुण बताए गए हैं। अनपेक्ष — किसी से कुछ माँगना नहीं। शुचि — मन और वाणी में शुद्धता। दक्ष — जो करना है, उसे कुशलता से करना। उदासीन — किसी पक्ष में न झुकना। गतव्यथ — अंदर से व्याकुलता खत्म।

और एक और — सर्वारम्भ-परित्यागी। यानी नए-नए उद्यमों, नई-नई योजनाओं में न उलझना। जैसे एक पकी उम्र के बुज़ुर्ग जो शांत होकर बैठते हैं — न कोई नई महत्वाकांक्षा, न कोई चिंता। बस शांत, स्थिर। ऐसा भक्त कृष्ण को प्रिय है।

यह भक्त-लक्षण श्रृंखला का चौथा श्लोक है। 12.13-16 तक आते-आते एक पूरा चित्र बनता है — द्वेष-रहित, संतुष्ट, दृढ़, किसी को भय न देने वाला, और अपेक्षा-रहित। यह भक्त की आंतरिक और बाहरी दोनों अवस्थाओं का वर्णन है।

परंपरा में 'सर्वारम्भपरित्यागी' शब्द को कर्म-संन्यास की भावना से जोड़कर देखा जाता रहा है — नए उद्यमों की ओर आसक्ति न होना, जो है उसी में शांत रहना।

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