📿 श्लोक संग्रह

यो न हृष्यति न द्वेष्टि

गीता 12.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥
यः
जो
न हृष्यति
हर्षित नहीं होता, उछलता नहीं
न द्वेष्टि
द्वेष नहीं करता
न शोचति
शोक नहीं करता
न काङ्क्षति
इच्छा नहीं करता
शुभाशुभपरित्यागी
शुभ और अशुभ दोनों का त्याग करने वाला
भक्तिमान्
भक्ति से पूर्ण
यः सः
वही
मे प्रियः
मुझे प्रिय है

यहाँ चार बातें हैं जो यह भक्त नहीं करता — न अत्यधिक हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न इच्छा करता है। और एक और — शुभ और अशुभ दोनों का त्याग। यानी न शुभ से चिपकता है, न अशुभ से डरता है।

जैसे एक पुराना शांत तालाब — बारिश में भी वही, धूप में भी वही। न लहरें उठती हैं, न सूख जाता है। बस स्थिर। जो भक्त जीवन के उतार-चढ़ाव में इसी स्थिरता से रहता है, और मन में भक्ति भरी है — कृष्ण कहते हैं वह मुझे प्रिय है।

यह भक्त-लक्षण श्रृंखला का पाँचवाँ श्लोक है। 12.13 से 12.17 तक आते-आते कृष्ण के प्रिय भक्त का एक समग्र चित्र बनता है — आंतरिक शांति, समभाव, द्वेष-रहितता और भक्ति से परिपूर्णता।

परंपरा में 'शुभाशुभपरित्यागी' वाक्यांश को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। यह भेद महत्वपूर्ण है — भक्त नैतिकता को नहीं छोड़ता, बल्कि शुभ-अशुभ के प्रति आसक्ति और भय दोनों को छोड़ता है।

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