यहाँ चार बातें हैं जो यह भक्त नहीं करता — न अत्यधिक हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न इच्छा करता है। और एक और — शुभ और अशुभ दोनों का त्याग। यानी न शुभ से चिपकता है, न अशुभ से डरता है।
जैसे एक पुराना शांत तालाब — बारिश में भी वही, धूप में भी वही। न लहरें उठती हैं, न सूख जाता है। बस स्थिर। जो भक्त जीवन के उतार-चढ़ाव में इसी स्थिरता से रहता है, और मन में भक्ति भरी है — कृष्ण कहते हैं वह मुझे प्रिय है।