यह श्लोक 12.18-19 के जोड़े का पहला हिस्सा है। यहाँ कृष्ण उस भक्त के बाहरी समभाव का वर्णन करते हैं। शत्रु हो या मित्र — समान। मान मिले या अपमान — समान। सर्दी हो या गर्मी, सुख हो या दुःख — सब में समान। और आसक्ति से रहित।
यह पत्थर की तरह निर्भावुकता नहीं है। यह एक दादा की परिपक्वता है जो जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव देख चुके हैं और अब किसी भी परिस्थिति में डोलते नहीं।