📿 श्लोक संग्रह

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी

गीता 12.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिः
निंदा और स्तुति को समान मानने वाला
मौनी
मौन रहने वाला
सन्तुष्टः
संतुष्ट
येन केनचित्
जो भी मिले, उसी से
अनिकेतः
बिना घर के, किसी स्थान से न बँधा हुआ
स्थिरमतिः
दृढ़ मन वाला, स्थिर बुद्धि वाला
भक्तिमान्
भक्ति से पूर्ण
मे प्रियः
मुझे प्रिय
नरः
मनुष्य

यह 12.18 का जोड़ा है और भक्त-लक्षण श्रृंखला का अंत है। निंदा हो या प्रशंसा — दोनों समान। मौन — यानी बेवजह वाचालता नहीं। जो भी मिले — उसमें संतुष्ट। अनिकेत — किसी एक जगह से बँधा नहीं। स्थिर मति — मन दृढ़ है। और भक्ति से भरा हुआ।

यह चित्र किसी त्यागी संन्यासी का भी है और किसी घर में रहने वाले भक्त का भी। 'अनिकेत' का अर्थ ज़रूरी नहीं कि घर छोड़ा हो — बल्कि मन किसी एक जगह या चीज़ से इतना बँधा नहीं कि उसके बिना न चले।

यह श्लोक 12.18-19 के जोड़े का दूसरा भाग है और भक्त-लक्षण श्रृंखला (12.13-19) का अंतिम श्लोक है। इसके बाद 12.20 में कृष्ण इस पूरे उपदेश का सार देते हैं।

परंपरा में इन सात श्लोकों (12.13-19) को 'भक्त-लक्षण' के नाम से जाना जाता रहा है। कहा जाता है कि इन्हें नित्य पाठ में शामिल किया जाता था।

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