यह 12.18 का जोड़ा है और भक्त-लक्षण श्रृंखला का अंत है। निंदा हो या प्रशंसा — दोनों समान। मौन — यानी बेवजह वाचालता नहीं। जो भी मिले — उसमें संतुष्ट। अनिकेत — किसी एक जगह से बँधा नहीं। स्थिर मति — मन दृढ़ है। और भक्ति से भरा हुआ।
यह चित्र किसी त्यागी संन्यासी का भी है और किसी घर में रहने वाले भक्त का भी। 'अनिकेत' का अर्थ ज़रूरी नहीं कि घर छोड़ा हो — बल्कि मन किसी एक जगह या चीज़ से इतना बँधा नहीं कि उसके बिना न चले।