📿 श्लोक संग्रह

निमित्तानि च पश्यामि

गीता 1.33 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥
निमित्तानि
शकुन / संकेत
और
पश्यामि
देखता हूँ
विपरीतानि
विपरीत / अशुभ
केशव
हे कृष्ण
नहीं
श्रेयः
कल्याण / भलाई
अनुपश्यामि
देख पाता हूँ
हत्वा
मारकर
स्वजनम्
अपने लोगों को
आहवे
युद्ध में

अर्जुन कहते हैं — हे केशव, मुझे चारों ओर अशुभ संकेत दिखाई दे रहे हैं। जैसे कोई यात्री रास्ते में बुरे शकुन देखकर रुक जाता है, वैसे ही अर्जुन का मन कह रहा है कि इस युद्ध से कुछ अच्छा नहीं होगा।

वे आगे कहते हैं कि अपने ही लोगों को मारकर युद्ध में कोई भलाई नहीं दिखती। जीत भी मिल जाए तो वह खुशी नहीं ला सकती, क्योंकि खुशी मनाने वाले अपने लोग ही तो नहीं रहेंगे।

यह श्लोक दिखाता है कि अर्जुन का विषाद अब गहरा हो चुका है — वे तर्क और भावना दोनों से युद्ध के विरुद्ध खड़े हैं।

यह श्लोक भगवद्गीता के प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग से है। कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ सामने खड़ी हैं और अर्जुन अपने गुरुओं, पितामहों और भाई-बन्धुओं को देखकर व्याकुल हो उठे हैं। यहाँ से अर्जुन के विषाद का चरम आरम्भ होता है।

परम्परा में इस श्लोक को अर्जुन की करुणा और संवेदनशीलता का प्रतीक माना गया है — वे केवल योद्धा नहीं, एक भावुक मनुष्य भी हैं।

अध्याय 1 · 33 / 47
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