📿 श्लोक संग्रह

निमित्तानि च पश्यामि

गीता 1.31 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥
निमित्तानि
शकुन (संकेत)
पश्यामि
देख रहा हूँ
विपरीतानि
अशुभ, उलटे
केशव
हे कृष्ण
नहीं
श्रेयः
कल्याण, भलाई
अनुपश्यामि
देखता हूँ
हत्वा
मारकर
स्वजनम्
अपने लोगों को
आहवे
युद्ध में

अर्जुन कहते हैं — "हे केशव! मुझे चारों ओर अशुभ संकेत दिखाई दे रहे हैं। और मुझे युद्ध में अपने लोगों को मारकर कोई भलाई नहीं दिखती।" अब अर्जुन का दुख शारीरिक से आगे बढ़कर नैतिक स्तर पर पहुँच गया है।

'विपरीतानि निमित्तानि' — अशुभ संकेत। प्राचीन काल में युद्ध से पहले शकुन देखने की परंपरा थी। अर्जुन को अपशकुन दिख रहे हैं — यह उनके भीतरी विक्षोभ का बाहरी प्रतिबिंब भी हो सकता है। जब मन दुखी होता है तो हर बात में अमंगल दिखने लगता है।

फिर अर्जुन सीधा प्रश्न उठाते हैं — अपनों को मारकर क्या भलाई होगी? यह एक ऐसा प्रश्न है जो हर युग में प्रासंगिक है — क्या कोई जीत इतनी बड़ी हो सकती है कि अपनों को खोने की क़ीमत चुकाई जाए?

यह श्लोक अर्जुन के विषाद को शारीरिक से नैतिक-दार्शनिक स्तर पर ले जाता है। अब तक शरीर की दशा बताई जा रही थी — अब अर्जुन एक गहरा प्रश्न पूछ रहे हैं: क्या यह युद्ध सही भी है?

कृष्ण इसका उत्तर दूसरे अध्याय में देंगे, जहाँ वे आत्मा की अमरता, कर्तव्य-पालन और निष्काम कर्म का उपदेश देंगे।

अध्याय 1 · 31 / 47
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