शंखनाद के बाद अब शस्त्र चलने का समय आ गया। अर्जुन — जिनके रथ की ध्वजा पर हनुमानजी विराजमान हैं — ने सामने कौरव सेना को युद्ध के लिए तैयार खड़ा देखा और अपना गाण्डीव धनुष उठाया।
'कपिध्वज' अर्जुन का एक विशेष नाम है। कपि का अर्थ है वानर, अर्थात हनुमानजी। अर्जुन के रथ पर हनुमानजी का चिह्न था — यह उनकी अपार शक्ति और देवताओं के आशीर्वाद का प्रतीक है।
यह क्षण बड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी अर्जुन पूरे आत्मविश्वास से युद्ध के लिए तैयार दिख रहे हैं। लेकिन अगले ही श्लोकों में वे कृष्ण से एक ऐसा निवेदन करेंगे जो उनके जीवन और पूरी गीता की दिशा बदल देगा।