📿 श्लोक संग्रह

सीदन्ति मम गात्राणि

गीता 1.29 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥
सीदन्ति
शिथिल हो रहे हैं
मम
मेरे
गात्राणि
अंग
मुखम्
मुँह
परिशुष्यति
सूख रहा है
वेपथुः
काँपना
शरीरे
शरीर में
मे
मेरे
रोमहर्षः
रोंगटे खड़े होना
जायते
हो रहा है

अर्जुन अपनी शारीरिक दशा बताते हैं — "मेरे सारे अंग ढीले पड़ रहे हैं, मुँह सूख रहा है, पूरा शरीर काँप रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं।" ये सब लक्षण गहरे भावनात्मक आघात के हैं।

जैसे किसी को अचानक कोई बहुत बुरी ख़बर मिले तो उसके हाथ-पैर काँपने लगते हैं, गला सूखता है, शरीर में अजीब-सी सिहरन होती है — ठीक वैसा ही अर्जुन के साथ हो रहा है। यह कोई साधारण भय नहीं है — अर्जुन ने सैकड़ों युद्ध लड़े हैं और कभी नहीं काँपे। यह काँपना अपनों को मारने की कल्पना से उत्पन्न हो रहा है।

रोमहर्ष — रोंगटे खड़ा होना — यह भय, विस्मय या गहरी भावना का शारीरिक चिह्न है। अर्जुन के पूरे शरीर ने मानो कह दिया है कि 'मैं इस युद्ध के लिए तैयार नहीं हूँ।'

यह श्लोक अर्जुन के शारीरिक लक्षणों का विस्तृत वर्णन करता है। आयुर्वेद और योग की दृष्टि से ये सभी लक्षण — अंगों का शिथिल होना, मुँह सूखना, काँपना, रोमांच — वात-प्रकोप और मानसिक अशांति के संकेत हैं जो अत्यधिक शोक से उत्पन्न होते हैं।

परंपरा में अर्जुन की यह दशा मानवीय करुणा की गहराई दर्शाती है — एक सच्चा योद्धा वह नहीं जो कुछ न अनुभव करे, बल्कि वह जो अनुभव करते हुए भी कर्तव्य पूरा करे।

अध्याय 1 · 29 / 47
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