📿 श्लोक संग्रह

तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः

गीता 1.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥
तान्
उन सबको
समीक्ष्य
भली-भाँति देखकर
सः
वह
कौन्तेयः
कुंतीपुत्र (अर्जुन)
सर्वान्
सभी
बन्धून्
बंधु-बांधवों को
अवस्थितान्
खड़े हुए
कृपया
करुणा से
परया
अत्यंत गहरी
आविष्टः
भर गया
विषीदन्
शोक करते हुए
अब्रवीत्
बोला

अपने सभी बंधु-बांधवों को दोनों ओर खड़ा देखकर कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यंत गहरी करुणा से भर गए और शोक में डूबकर बोले। यह वह क्षण है जहाँ गीता के पहले अध्याय का नाम — 'अर्जुनविषादयोग' — सार्थक होता है।

'कृपया परया आविष्टः' — इसका अर्थ है कि अर्जुन के मन में क्रोध या भय नहीं, बल्कि गहरी करुणा उमड़ आई। जैसे कोई माँ अपने बच्चों को आपस में लड़ता देख दुखी हो जाती है, वैसे ही अर्जुन का हृदय अपनों को शत्रु के रूप में देखकर पिघल गया।

यहाँ से अर्जुन का प्रसिद्ध विषाद-भाषण शुरू होता है जिसमें वे एक-एक करके अपनी पीड़ा, अपनी दुविधा और अपनी असमर्थता व्यक्त करेंगे। यही विषाद आगे कृष्ण के दिव्य उपदेश का द्वार खोलेगा।

यह श्लोक गीता की कथा-संरचना में एक निर्णायक मोड़ है। अब तक संजय का वर्णन था — अब अर्जुन स्वयं बोलने लगते हैं। 'विषीदन्' (शोक करते हुए) शब्द बताता है कि अर्जुन भीतर से टूट चुके हैं।

परंपरा में अर्जुन का यह विषाद कमज़ोरी नहीं, बल्कि संवेदनशीलता माना जाता है। जो व्यक्ति अपनों के दुख से विचलित न हो, वह पत्थर-हृदय है। अर्जुन की यही मानवीयता उन्हें कृष्ण के उपदेश का पात्र बनाती है।

अध्याय 1 · 27 / 47
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