📿 श्लोक संग्रह

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं

गीता 1.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥
योत्स्यमानान्
युद्ध करने वालों को
अवेक्षे
देखना चाहता हूँ
अहम्
मैं
ये
जो
एते
ये सब
अत्र
यहाँ
समागताः
इकट्ठे हुए हैं
धार्तराष्ट्रस्य
दुर्योधन का
दुर्बुद्धेः
दुष्ट बुद्धि वाले का
प्रियचिकीर्षवः
भला करने की इच्छा रखने वाले

अर्जुन कहते हैं — "मैं उन लोगों को देखना चाहता हूँ जो दुर्बुद्धि दुर्योधन का भला चाहकर यहाँ युद्ध के लिए आए हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि कौन-कौन उसके पक्ष में खड़ा है।"

ध्यान दीजिए — अर्जुन दुर्योधन को 'दुर्बुद्धि' कहते हैं। इसका अर्थ है कि अर्जुन के मन में अभी क्रोध और दृढ़ता दोनों हैं। वे स्पष्ट रूप से मानते हैं कि दुर्योधन ग़लत है और जो उसका साथ दे रहे हैं, वे भी ग़लत पक्ष में हैं।

लेकिन यही अर्जुन कुछ ही क्षणों बाद जब उन 'शत्रुओं' के चेहरे पहचानेंगे — अपने गुरु द्रोण, पितामह भीष्म, मामा शल्य — तब 'दुर्बुद्धि के साथी' अचानक 'अपने लोग' बन जाएँगे और उनका सारा संकल्प बिखर जाएगा।

यह श्लोक अर्जुन की उस मनःस्थिति को दिखाता है जो विषाद से ठीक पहले थी। अभी वे एक क्षत्रिय योद्धा हैं — शत्रु को देखना चाहते हैं, उनसे लड़ने को तैयार हैं। यह 'पहले' और 'बाद' का अंतर ही गीता के पहले अध्याय की नाटकीयता है।

'प्रियचिकीर्षवः' शब्द गहरा है — दुर्योधन का 'प्रिय' करने वाले। अर्जुन मानो कह रहे हैं कि ये लोग एक ग़लत इंसान की ख़ुशी के लिए अपनी जान दाँव पर लगा रहे हैं।

अध्याय 1 · 23 / 47
← पिछला अध्याय 1 · 23 / 47 अगला →