यह वह क्षण है जब अर्जुन पहली बार गीता में बोलते हैं। वे कृष्ण से कहते हैं — "हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले चलो, ताकि मैं देख सकूँ कि युद्ध करने की इच्छा से कौन-कौन यहाँ खड़े हैं।"
अभी अर्जुन एक आत्मविश्वासी योद्धा की तरह बोल रहे हैं। वे शत्रु को देखना चाहते हैं, उनका आकलन करना चाहते हैं — जैसे कोई सेनापति लड़ाई से पहले मैदान का जायज़ा लेता है। लेकिन इसी 'देखने' में वह दृश्य दिखेगा जो उनका सारा साहस हिला देगा।
'अच्युत' नाम का अर्थ है — जो कभी अपनी स्थिति से न गिरें। अर्जुन अनजाने में कृष्ण का वह नाम ले रहे हैं जो जल्दी ही उन्हें सहारा देगा जब वे स्वयं डगमगा जाएँगे।