📿 श्लोक संग्रह

सेनयोरुभयोर्मध्ये

गीता 1.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
अर्जुन उवाच — सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ॥
अर्जुन उवाच
अर्जुन ने कहा
सेनयोः
दोनों सेनाओं के
उभयोः
दोनों के
मध्ये
बीच में
रथम्
रथ को
स्थापय
खड़ा करो
मे
मेरा
अच्युत
हे कृष्ण (जो कभी गिरें नहीं)
निरीक्षे
देख लूँ
योद्धुकामान्
युद्ध की इच्छा रखने वालों को
अवस्थितान्
खड़े हुए

यह वह क्षण है जब अर्जुन पहली बार गीता में बोलते हैं। वे कृष्ण से कहते हैं — "हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले चलो, ताकि मैं देख सकूँ कि युद्ध करने की इच्छा से कौन-कौन यहाँ खड़े हैं।"

अभी अर्जुन एक आत्मविश्वासी योद्धा की तरह बोल रहे हैं। वे शत्रु को देखना चाहते हैं, उनका आकलन करना चाहते हैं — जैसे कोई सेनापति लड़ाई से पहले मैदान का जायज़ा लेता है। लेकिन इसी 'देखने' में वह दृश्य दिखेगा जो उनका सारा साहस हिला देगा।

'अच्युत' नाम का अर्थ है — जो कभी अपनी स्थिति से न गिरें। अर्जुन अनजाने में कृष्ण का वह नाम ले रहे हैं जो जल्दी ही उन्हें सहारा देगा जब वे स्वयं डगमगा जाएँगे।

यह श्लोक गीता की कथा में एक निर्णायक मोड़ है। अर्जुन का यह साधारण-सा निवेदन — 'रथ बीच में ले चलो' — आगे चलकर उनके गहरे विषाद और फिर कृष्ण के अमर उपदेश का कारण बनता है।

यहाँ अर्जुन और कृष्ण का रिश्ता सखा-सखा का है। अर्जुन आदेश नहीं दे रहे, विनम्र निवेदन कर रहे हैं। कृष्ण सारथी हैं, लेकिन वे स्वयं भगवान हैं — यह विरोधाभास गीता की अनूठी सुंदरता है।

अध्याय 1 · 21 / 47
← पिछला अध्याय 1 · 21 / 47 अगला →