📿 श्लोक संग्रह

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य

गीता 9.32 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥
माम् हि
मेरी ही
पार्थ
हे पार्थ — अर्जुन
व्यपाश्रित्य
शरण लेकर
ये अपि
जो भी
स्युः पापयोनयः
पापजन्म वाले हों
स्त्रियः
स्त्रियाँ
वैश्याः
वैश्य
शूद्राः
शूद्र
ते अपि
वे भी
यान्ति परां गतिम्
परम गति पाते हैं

भगवान यहाँ एक बड़ी बात कहते हैं — मेरी शरण में जो भी आए — स्त्री हो, वैश्य हो, शूद्र हो, यहाँ तक कि जिन्हें 'पापजन्म' कहा जाता था — वे सब परम गति पाते हैं।

यह उस युग में एक समावेशी वचन था। भक्ति का मार्ग किसी जन्म या जाति से बंधा नहीं है — यह भगवान स्वयं कह रहे हैं।

यह श्लोक 9.29-9.31 की उस भावना को पूरा करता है जहाँ भगवान ने भक्ति की सर्वसुलभता बताई। वहाँ 'दुराचारी' की बात थी, यहाँ समाज के हर वर्ग की।

परंपरा में इस श्लोक को भक्तिमार्ग की व्यापकता का आधार माना जाता रहा है। भागवत-परंपरा और संत साहित्य में बार-बार इसी उदारता को केंद्र में रखा गया है।

अध्याय 9 · 32 / 34
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