भगवान 9.30 की बात का परिणाम बताते हैं। वह दुराचारी जो अनन्य भक्ति का मार्ग चुनता है — वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है। भक्ति का बल उसे भीतर से बदल देता है।
फिर भगवान अर्जुन से कहते हैं — 'प्रतिजानीहि' — यह घोषणा कर दो — मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। यह गीता का एक अभय-वचन है — भगवान की प्रतिज्ञा।