📿 श्लोक संग्रह

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्याः

गीता 9.33 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥
किम् पुनः
फिर क्या कहना
ब्राह्मणाः पुण्याः
पुण्यशाली ब्राह्मण
भक्ताः राजर्षयः
भक्त राजर्षि
अनित्यम्
अनित्य — नाशवान
असुखम्
सुखहीन — दुःखमय
लोकम् इमम्
इस जगत को
प्राप्य
पाकर
भजस्व माम्
मुझे भजो

भगवान कहते हैं — जब पापजन्म वाले भी परम गति पाते हैं, तो जो पुण्यशाली ब्राह्मण और राजर्षि भक्त हैं — उनके बारे में क्या कहना। उनके लिए तो यह मार्ग और भी सुलभ है।

फिर भगवान एक सीधी बात कहते हैं — 'अनित्यमसुखं लोकम्' — यह जगत नाशवान और सुखहीन है। इसे पाकर भी मुझे भजो। यह श्लोक भक्ति का निमंत्रण है — आग्रह नहीं।

यह श्लोक 9.32 और 9.34 के बीच की कड़ी है। एक तरफ भक्ति की सर्वव्यापकता, दूसरी तरफ उसका आह्वान। 'अनित्यमसुखं' की बात गीता 8.15 में भी आई है — 'दुःखालयमशाश्वतम्'।

परंपरा में इस जगत को 'अनित्य' और 'असुखम्' कहना भागने का संदेश नहीं, बल्कि सही दिशा में जागने का संदेश माना गया है।

अध्याय 9 · 33 / 34
अध्याय 9 · 33 / 34 अगला →