📿 श्लोक संग्रह

मन्मना भव मद्भक्तः

गीता 9.34 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥
मन्मनाः भव
मुझमें मन वाला बनो
मद्भक्तः
मेरा भक्त बनो
मद्याजी
मेरा यजन करने वाला
मां नमस्कुरु
मुझे नमस्कार करो
माम् एव एष्यसि
मुझे ही पाओगे
युक्त्वा एवम्
इस प्रकार जुड़कर
आत्मानम्
अपने आप को
मत्परायणः
मुझे परम लक्ष्य मानने वाला

पूरे नौवें अध्याय का सार इस एक श्लोक में आ जाता है। भगवान कहते हैं — मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरा यजन करो, मुझे नमन करो। बस इतना करो।

और परिणाम? — 'मामेवैष्यसि' — मुझे ही पाओगे। 'मत्परायणः' — जो मुझे परम लक्ष्य माने। यह पूरा अध्याय एक बड़े प्रश्न का उत्तर है — भगवान को कैसे पाएँ? — और यह श्लोक वह उत्तर है।

यह श्लोक गीता 18.65 में भी लगभग वैसे ही आएगा — 'मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।' यह दोहराव जानबूझकर है — भगवान इस संदेश को अंत तक याद दिलाते हैं।

नौवाँ अध्याय 'राजविद्याराजगुह्य' — विद्याओं का राजा, रहस्यों का राजा — यहाँ समाप्त होता है। और वह 'राजगुह्य' यही है — भक्ति, समर्पण, और मत्परायणता।

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