भगवान यहाँ एक सीधा नियम बताते हैं — जो जिसे पूजता है, वह वहीं पहुँचता है। देव-भक्त देवों के पास, पितर-भक्त पितरों के पास, भूत-भक्त भूतों के पास जाते हैं।
और जो मेरी पूजा करते हैं — 'मद्याजिनः' — वे मुझे पाते हैं। इसमें एक संकेत भी है — मेरी भक्ति का फल सबसे स्थायी है। देव और पितर लोक भी अंततः अस्थायी हैं।