📿 श्लोक संग्रह

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये

गीता 9.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥
ज्ञानयज्ञेन
ज्ञान-यज्ञ से
च अपि
और भी
अन्ये
अन्य लोग
यजन्तः
पूजन करते हुए
माम् उपासते
मेरी उपासना करते हैं
एकत्वेन
एकता के भाव से
पृथक्त्वेन
अलग-अलग रूपों में
बहुधा
अनेक प्रकार से
विश्वतोमुखम्
विश्व के सभी मुख वाले को

कृष्ण कहते हैं — कुछ लोग ज्ञान-यज्ञ से मेरी उपासना करते हैं। कोई एकत्व के भाव से — यानी सब में एक को देखकर। कोई अलग-अलग रूपों में। कोई अनेक प्रकार से।

यह श्लोक बताता है कि परमात्मा तक पहुँचने के रास्ते एक नहीं हैं। ज्ञान-मार्ग, भक्ति-मार्ग, अद्वैत-दृष्टि, बहुदेव-पूजा — सभी उसी एक की ओर जाते हैं।

9.15 एक समावेशी श्लोक है। 9.13-9.14 में भक्ति-मार्ग था, अब 9.15 में ज्ञान-मार्ग और अन्य मार्गों को भी स्थान दिया गया है।

ऋग्वेद (1.164.46) में 'एकं सद् विप्राः बहुधा वदन्ति' — एक सत् को ज्ञानी अनेक नाम देते हैं — यही भाव यहाँ 'बहुधा विश्वतोमुखम्' में है।

अध्याय 9 · 15 / 34
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