📿 श्लोक संग्रह

सततं कीर्तयन्तो मां

गीता 9.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥
सततं
सदा, निरंतर
कीर्तयन्तः
कीर्तन करते हुए
मां
मुझे
यतन्तः
प्रयत्न करते हुए
दृढव्रताः
दृढ़ व्रत वाले
नमस्यन्तः
प्रणाम करते हुए
भक्त्या
भक्ति से
नित्ययुक्ताः
सदा युक्त, जुड़े हुए
उपासते
उपासना करते हैं

महात्माओं का आचरण बताते हुए कृष्ण कहते हैं — वे सदा मेरा कीर्तन करते हैं, दृढ़ व्रत के साथ प्रयत्न करते हैं, भक्ति से प्रणाम करते हैं। यह उनकी साधना है — थकान नहीं, स्वाभाविकता है।

'सततं' और 'नित्ययुक्ताः' — दोनों शब्द निरंतरता की बात करते हैं। यह भजन कभी-कभी नहीं, जीवन की धारा की तरह है। जैसे नदी बिना रुके बहती है।

9.14 में महात्माओं के तीन कार्य हैं — कीर्तन, यत्न, नमस्कार। ये तीनों मन, शरीर और वाणी — तीनों स्तरों पर की जाने वाली भक्ति के प्रतीक हैं।

नारद भक्ति सूत्र में भी 'सततं कीर्तन' को भक्ति का सर्वोच्च लक्षण माना गया है — यह गीता का यह श्लोक उसी परंपरा का आधार है।

अध्याय 9 · 14 / 34
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