9.12 में मोह में फँसे लोगों की बात थी — अब 9.13 में उनका उलट चित्र आता है। महात्मा दैवी स्वभाव में स्थित होकर मुझे अनन्य मन से भजते हैं। वे जानते हैं कि मैं सबका आदि और अव्यय हूँ।
अनन्य मन का अर्थ है — जिस मन में कोई और नहीं, बस परमात्मा। जैसे नमक पानी में घुल जाए। यह बात जटिल नहीं है — बस मन की दिशा एक होनी चाहिए।