📿 श्लोक संग्रह

मोघाशा मोघकर्माणः

गीता 9.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥
मोघाशाः
व्यर्थ आशाएँ
मोघकर्माणः
निष्फल कर्म वाले
मोघज्ञानाः
व्यर्थ ज्ञान वाले
विचेतसः
विकृत बुद्धि वाले
राक्षसीम्
राक्षसी
आसुरीं
आसुरी
प्रकृतिं
स्वभाव को
मोहिनीं
मोह में डालने वाली
श्रिताः
आश्रय लिए हुए

जो लोग परमात्मा को नहीं पहचानते, उनकी आशाएँ व्यर्थ जाती हैं, उनके कर्म निष्फल होते हैं, उनका ज्ञान भी काम नहीं आता। वे मोहिनी प्रकृति में फँसे रहते हैं।

यहाँ 'राक्षसी' और 'आसुरी' शब्द किसी जाति या वर्ग के लिए नहीं हैं — ये मन की अवस्थाओं के नाम हैं। जो परमात्मा को अनदेखा करे, वह मन राक्षसी भाव से ग्रस्त है।

9.12 में 'मोघ' शब्द तीन बार आता है — मोघाशा, मोघकर्मा, मोघज्ञान। यह त्रय उस स्थिति का पूरा चित्र है जहाँ परमात्मा की उपेक्षा हो।

गीता के अध्याय 16 (16.4-16.6) में आसुरी और दैवी स्वभाव का विस्तृत वर्णन है — 9.12 उस पूरे प्रकरण की भूमिका है।

अध्याय 9 · 12 / 34
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