📿 श्लोक संग्रह

अहं क्रतुरहं यज्ञः

गीता 9.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥
अहं क्रतुः
मैं वैदिक यज्ञ-अनुष्ठान
अहं यज्ञः
मैं यज्ञ
स्वधा अहम्
मैं पितरों की आहुति
अहम् ओषधम्
मैं जड़ी-बूटी
मन्त्रः अहम्
मैं मंत्र
अहम् एव आज्यम्
मैं ही घी
अहम् अग्निः
मैं अग्नि
अहं हुतम्
मैं हवन की क्रिया

यह श्लोक बड़ा सुंदर है। कृष्ण कहते हैं — यज्ञ में जो क्रतु है, जो यज्ञ है, जो स्वधा है, जो ओषधि है, जो मंत्र है, जो घी है, जो अग्नि है, जो हवन की क्रिया है — वह सब मैं हूँ।

इसका अर्थ यह नहीं कि यज्ञ करना ज़रूरी है। इसका अर्थ यह है कि जो भी शुभ कार्य होता है — उसके भीतर वह परमात्मा की ही शक्ति है। पूजा का हर तत्व उसी का रूप है।

9.16 में 'अहम्' शब्द आठ बार आता है। यह एक काव्यात्मक घोषणा है — यज्ञ के हर अंग में परमात्मा की उपस्थिति। 9.17 में यह सूची और विस्तृत होती है।

पुरुष सूक्त (ऋग्वेद 10.90) में भी यज्ञ को सृष्टि का आदि कारण बताया गया है — और यहाँ कृष्ण उस यज्ञ के भी स्वामी हैं।

अध्याय 9 · 16 / 34
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