📿 श्लोक संग्रह

महात्मानस्तु मां पार्थ

गीता 9.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 9 — राजविद्याराजगुह्ययोग
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥
महात्मानः
महात्मा, बड़े मन वाले
तु
किंतु, परंतु
मां पार्थ
मुझे, हे पार्थ
दैवीं प्रकृतिम्
दैवी स्वभाव को
आश्रिताः
आश्रय लिए हुए
भजन्ति
भजते हैं
अनन्यमनसः
अनन्य मन से
ज्ञात्वा
जानकर
भूतादिम्
सभी का आदि
अव्ययम्
अविनाशी

9.12 में मोह में फँसे लोगों की बात थी — अब 9.13 में उनका उलट चित्र आता है। महात्मा दैवी स्वभाव में स्थित होकर मुझे अनन्य मन से भजते हैं। वे जानते हैं कि मैं सबका आदि और अव्यय हूँ।

अनन्य मन का अर्थ है — जिस मन में कोई और नहीं, बस परमात्मा। जैसे नमक पानी में घुल जाए। यह बात जटिल नहीं है — बस मन की दिशा एक होनी चाहिए।

9.13 और 9.14 एक साथ पढ़ने चाहिए। 9.13 में महात्मा की पहचान है — दैवी प्रकृति और अनन्य भाव। 9.14 में उनके कर्म — कीर्तन, प्रणाम, भक्ति।

गीता के अध्याय 12 (12.2) में भी 'अनन्यचेताः' का प्रयोग है — जो मुझे अनन्य चित्त से भजता है वह योगियों में श्रेष्ठ है। यहाँ 9.13 उसी भाव की पूर्व-भूमिका है।

अध्याय 9 · 13 / 34
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