📿 श्लोक संग्रह

नैते सृती पार्थ जानन्

गीता 8.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥
न एते सृती
इन दोनों मार्गों को
पार्थ
हे पार्थ
जानन्
जानते हुए
योगी
योगी
मुह्यति
मोहित होता है
कश्चन
कोई भी
तस्मात्
इसलिए
सर्वेषु कालेषु
सभी समय में
योगयुक्तः
योग से युक्त
भव
हो जाओ
अर्जुन
हे अर्जुन

कृष्ण कहते हैं — हे पार्थ, इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन, तुम सदा योग से युक्त रहो।

यह बड़ी व्यावहारिक बात है। कृष्ण यह नहीं कह रहे कि उत्तरायण की प्रतीक्षा करो या शुक्ल पक्ष का इंतज़ार करो। वे कह रहे हैं — "सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भव" — हर समय योग में स्थित रहो। जो हमेशा भगवान से जुड़ा है, उसे काल की चिंता करने की ज़रूरत नहीं।

जैसे जो बच्चा रोज़ पढ़ता है, उसे परीक्षा से डर नहीं लगता — वैसे ही जो योगी सदा भगवान से जुड़ा रहता है, उसे मृत्यु के समय या मार्ग की चिंता नहीं होती। यह श्लोक 8.7 की बात को दोहराता है — "तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च"।

यह श्लोक शुक्ल-कृष्ण गति (8.23-8.26) के विषय का उपसंहार है। कृष्ण का संदेश स्पष्ट है — मार्गों के ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है सदा योग में स्थित रहना।

अगला और अंतिम श्लोक (8.28) इस पूरे अध्याय का समापन करता है, जिसमें कृष्ण बताते हैं कि इस ज्ञान को जानने वाला सभी पुण्य-फलों से ऊपर उठ जाता है।

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