कृष्ण कहते हैं — हे पार्थ, इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन, तुम सदा योग से युक्त रहो।
यह बड़ी व्यावहारिक बात है। कृष्ण यह नहीं कह रहे कि उत्तरायण की प्रतीक्षा करो या शुक्ल पक्ष का इंतज़ार करो। वे कह रहे हैं — "सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भव" — हर समय योग में स्थित रहो। जो हमेशा भगवान से जुड़ा है, उसे काल की चिंता करने की ज़रूरत नहीं।
जैसे जो बच्चा रोज़ पढ़ता है, उसे परीक्षा से डर नहीं लगता — वैसे ही जो योगी सदा भगवान से जुड़ा रहता है, उसे मृत्यु के समय या मार्ग की चिंता नहीं होती। यह श्लोक 8.7 की बात को दोहराता है — "तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च"।