यह अध्याय 8 का अंतिम श्लोक है। कृष्ण कहते हैं — वेदों के अध्ययन, यज्ञों, तपस्याओं और दानों में जो भी पुण्य-फल बताया गया है — इस ज्ञान को जानने वाला योगी उन सबसे ऊपर उठ जाता है और उस परम, आदि स्थान को प्राप्त करता है।
कितनी बड़ी बात है! वेदों का पढ़ना, यज्ञ करना, तपस्या करना, दान देना — ये सब बहुत अच्छे कर्म हैं। लेकिन इस अध्याय का ज्ञान — भगवान का निरंतर स्मरण, अनन्य भक्ति — इन सबसे भी ऊपर है। जैसे नदी बहुत अच्छी होती है, पर समुद्र उन सबसे बड़ा है — वैसे ही भगवान की भक्ति सब पुण्यों से बड़ी है।
यह श्लोक पूरे अध्याय का सार है — भगवान को जानो, उनसे जुड़ो, हर समय उन्हें याद करो — बस यही सबसे बड़ा पुण्य है, सबसे बड़ी साधना है।