📿 श्लोक संग्रह

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु

गीता 8.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥
वेदेषु
वेदों के अध्ययन में
यज्ञेषु
यज्ञों में
तपःसु
तपस्याओं में
च एव
और भी
दानेषु
दानों में
यत् पुण्यफलम्
जो पुण्य-फल
प्रदिष्टम्
बताया गया है
अत्येति
पार कर जाता है
तत् सर्वम्
उन सबको
इदम् विदित्वा
इसे जानकर
योगी
योगी
परम् स्थानम्
परम स्थान
उपैति
प्राप्त करता है
आद्यम्
आदि (मूल) को

यह अध्याय 8 का अंतिम श्लोक है। कृष्ण कहते हैं — वेदों के अध्ययन, यज्ञों, तपस्याओं और दानों में जो भी पुण्य-फल बताया गया है — इस ज्ञान को जानने वाला योगी उन सबसे ऊपर उठ जाता है और उस परम, आदि स्थान को प्राप्त करता है।

कितनी बड़ी बात है! वेदों का पढ़ना, यज्ञ करना, तपस्या करना, दान देना — ये सब बहुत अच्छे कर्म हैं। लेकिन इस अध्याय का ज्ञान — भगवान का निरंतर स्मरण, अनन्य भक्ति — इन सबसे भी ऊपर है। जैसे नदी बहुत अच्छी होती है, पर समुद्र उन सबसे बड़ा है — वैसे ही भगवान की भक्ति सब पुण्यों से बड़ी है।

यह श्लोक पूरे अध्याय का सार है — भगवान को जानो, उनसे जुड़ो, हर समय उन्हें याद करो — बस यही सबसे बड़ा पुण्य है, सबसे बड़ी साधना है।

यह श्लोक अक्षरब्रह्मयोग (अध्याय 8) का समापन है। पूरे अध्याय में अर्जुन के सात प्रश्नों के उत्तर, मृत्यु-काल का स्मरण, ध्यान-विधि, सृष्टि-प्रलय चक्र, शुक्ल-कृष्ण गति — सब कुछ बताया गया। और अंत में कृष्ण कहते हैं कि यह ज्ञान सब पुण्यों से बढ़कर है।

अगले अध्याय (9 — राजविद्याराजगुह्ययोग) में कृष्ण इसी विषय को और गहरा करेंगे — "राजविद्या" अर्थात विद्याओं की रानी, "राजगुह्य" अर्थात रहस्यों का राजा।

अध्याय 8 · 28 / 28
अध्याय 9 → अध्याय 8 · 28 / 28 अगला →