📿 श्लोक संग्रह

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः

गीता 8.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥
धूमः
धुआँ (अंधकार)
रात्रिः
रात
तथा
वैसे ही
कृष्णः
कृष्ण पक्ष
षण्मासाः
छः मास
दक्षिणायनम्
दक्षिणायन (सूर्य दक्षिण की ओर)
तत्र
उसमें
चान्द्रमसम् ज्योतिः
चन्द्रमा का प्रकाश
योगी प्राप्य
योगी प्राप्त करके
निवर्तते
लौट आता है

अब कृष्ण "कृष्ण गति" — अंधकार का मार्ग — बता रहे हैं। धुआँ, रात, कृष्ण पक्ष, और दक्षिणायन के छः मास — यह अंधकार का मार्ग है। इस मार्ग से जाने वाला योगी चन्द्रलोक को प्राप्त करके फिर लौट आता है अर्थात पुनर्जन्म लेता है।

उपनिषदों में इसे "पितृयान मार्ग" कहा गया है — पितरों का मार्ग। जो लोग शुभ कर्म करते हैं पर ब्रह्मज्ञान नहीं रखते, वे इस मार्ग से स्वर्गलोक तक जाते हैं, वहाँ पुण्य का फल भोगते हैं, और फिर पृथ्वी पर लौट आते हैं।

यह कोई बुरा मार्ग नहीं है — पर यह अंतिम मुक्ति नहीं देता। जैसे किराए के अच्छे मकान में रहना सुखद तो है, पर वह अपना घर नहीं है।

श्लोक 8.24 और 8.25 मिलकर दो गतियों का वर्णन करते हैं — शुक्ल (प्रकाश) और कृष्ण (अंधकार)। अगला श्लोक (8.26) इन दोनों का सारांश देता है।

यह ध्यान रखना चाहिए कि ये वैदिक प्रतीक हैं — अग्नि, ज्योति, धूम आदि सांकेतिक शब्द हैं जो ज्ञान और अज्ञान के मार्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

अध्याय 8 · 25 / 28
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