कृष्ण एक बहुत महत्वपूर्ण बात बता रहे हैं — ब्रह्मलोक सहित सभी लोक "पुनरावर्ती" हैं, अर्थात वहाँ से भी लौटना पड़ता है। चाहे कोई स्वर्ग जाए, इंद्रलोक जाए, या ब्रह्मलोक तक — पुण्य समाप्त होने पर वापस आना ही पड़ता है। लेकिन जो मुझे (भगवान को) प्राप्त करता है, उसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता।
इसे ऐसे समझें — जैसे किराए का मकान कितना भी अच्छा हो, एक दिन छोड़ना पड़ता है। लेकिन अपना घर अपना ही रहता है। वैसे ही सभी लोक किराए के मकान हैं — केवल भगवान का धाम अपना शाश्वत घर है।
यह श्लोक बताता है कि स्वर्ग की कामना करना भी अंतिम लक्ष्य नहीं है — अंतिम लक्ष्य तो भगवान की प्राप्ति है, जहाँ से लौटना नहीं होता।