📿 श्लोक संग्रह

प्रयाणकाले मनसाचलेन

गीता 8.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥
प्रयाणकाले
मृत्यु के समय
मनसा अचलेन
अचल मन से
भक्त्या युक्तः
भक्ति से युक्त
योगबलेन
योग के बल से
च एव
और भी
भ्रुवोः मध्ये
दोनों भौंहों के बीच
प्राणम् आवेश्य
प्राण को स्थापित करके
सम्यक्
भली-भाँति
सः
वह
परम् पुरुषम् दिव्यम्
दिव्य परम पुरुष को
उपैति
प्राप्त होता है

कृष्ण ध्यान की एक विशेष विधि बताते हैं — मृत्यु के समय अचल मन से, भक्ति और योगबल के साथ, दोनों भौंहों के बीच प्राण को स्थापित करके जो परमात्मा का ध्यान करता है, वह उस दिव्य परम पुरुष को प्राप्त होता है।

भौंहों के बीच का स्थान — जिसे आज्ञा चक्र भी कहते हैं — योग परंपरा में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। जब हम आँखें बंद करके ध्यान लगाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से ध्यान इसी बिंदु पर टिकता है।

लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि केवल योग-तकनीक पर्याप्त नहीं — "भक्त्या युक्तः" — भक्ति भी चाहिए। मन में प्रेम हो, श्रद्धा हो — तभी यह विधि फलदायी होती है।

श्लोक 8.9 और 8.10 मिलकर एक पूर्ण ध्यान-विधि प्रस्तुत करते हैं — 8.9 में बताया किसका ध्यान करें (परमात्मा के गुण), 8.10 में बताया कैसे ध्यान करें (भक्ति + योगबल + प्राण-स्थापन)।

अगले श्लोकों (8.11-8.13) में कृष्ण ओंकार के उच्चारण सहित और विस्तृत विधि बताते हैं।

अध्याय 8 · 10 / 28
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