कृष्ण ध्यान की एक विशेष विधि बताते हैं — मृत्यु के समय अचल मन से, भक्ति और योगबल के साथ, दोनों भौंहों के बीच प्राण को स्थापित करके जो परमात्मा का ध्यान करता है, वह उस दिव्य परम पुरुष को प्राप्त होता है।
भौंहों के बीच का स्थान — जिसे आज्ञा चक्र भी कहते हैं — योग परंपरा में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। जब हम आँखें बंद करके ध्यान लगाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से ध्यान इसी बिंदु पर टिकता है।
लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि केवल योग-तकनीक पर्याप्त नहीं — "भक्त्या युक्तः" — भक्ति भी चाहिए। मन में प्रेम हो, श्रद्धा हो — तभी यह विधि फलदायी होती है।