📿 श्लोक संग्रह

साधिभूताधिदैवं माम्

गीता 7.30 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥
स-अधिभूत-अधिदैवम्
अधिभूत और अधिदैव सहित
माम्
मुझको
स-अधियज्ञम् च
और अधियज्ञ सहित
ये विदुः
जो जानते हैं
प्रयाणकाले
अंतकाल में, मृत्यु के समय
अपि च
भी
माम्
मुझको
ते विदुः
वे जानते हैं
युक्तचेतसः
योगयुक्त मन वाले

अध्याय 7 का अंतिम श्लोक। कृष्ण कहते हैं — जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित जानते हैं, वे युक्त मन से मृत्यु के समय भी मुझे जानते हैं।

अधिभूत यानी भौतिक जगत में मेरा स्वरूप; अधिदैव यानी देव-जगत में; अधियज्ञ यानी यज्ञ में। जो इन तीनों स्तरों पर मुझे पहचान लेता है — उसका ज्ञान इतना पक्का है कि मृत्यु के क्षण में भी नहीं डिगता।

मृत्यु की बात सुनकर डरने की जरूरत नहीं। यह श्लोक आश्वासन देता है — जिसने जीते-जी जान लिया, उसे अंत में भी याद रहेगा। यह 8वें अध्याय का द्वार खोलता है।

यह श्लोक अध्याय 7 का समापन है। 'अधिभूत-अधिदैव-अधियज्ञ' — ये तीन शब्द अगले अध्याय 8 के पहले प्रश्न हैं जो अर्जुन पूछेगा। इस तरह 7.30 एक सेतु है — ज्ञानविज्ञानयोग से अक्षरब्रह्मयोग तक।

बृहदारण्यक उपनिषद् में उद्दालक कहते हैं कि मृत्यु के समय जो जानता है वह मुक्त होता है। गीता का 'प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुः' उसी परंपरा का सरल कथन है।

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