📿 श्लोक संग्रह

येषां त्वन्तगतं पापम्

गीता 7.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
येषाम्
जिनका
तु
लेकिन
अन्तगतम्
अंत को प्राप्त, समाप्त
पापम्
पाप
जनानाम्
लोगों का
पुण्यकर्मणाम्
पुण्य कर्म करने वालों का
ते
वे
द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः
द्वंद्व-मोह से मुक्त
भजन्ते
भजते हैं
माम्
मुझको
दृढव्रताः
दृढ़ व्रत वाले

7.27 में कहा — द्वंद्व-मोह से सब जन्म लेते ही भटक जाते हैं। यहाँ उपाय है — जिनके पाप समाप्त हो गए हैं, जो पुण्य कर्म करते रहे हैं, वे इस द्वंद्व-मोह से मुक्त होकर दृढ़ व्रत से मुझे भजते हैं।

यह एक आशा का श्लोक है। जैसे जमी हुई मिट्टी में पानी डालते-डालते एक दिन बीज अंकुरित होता है — वैसे ही पुण्य कर्मों से धीरे-धीरे द्वंद्व-मोह कम होता है और परमात्मा की ओर मन लगने लगता है।

'दृढव्रताः' — दृढ़ व्रत। जो एक बार तय कर लेते हैं, वे डगमगाते नहीं।

7.27-7.28 द्वंद्व-मोह से लेकर उससे मुक्ति तक की यात्रा दिखाते हैं। 7.29-7.30 में यह मुक्त आत्मा क्या जानती है — यह अगले दो श्लोकों का विषय है।

महाभारत के वन पर्व में भी कहा गया है कि तप और पुण्य कर्म से ज्ञान का मार्ग खुलता है। गीता यहाँ उसी परंपरा में पुण्यकर्म को द्वंद्व-मुक्ति का उपाय बताती है।

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