📿 श्लोक संग्रह

जरामरणमोक्षाय

गीता 7.29 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥
जरामरण मोक्षाय
बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्ति के लिए
माम् आश्रित्य
मेरी शरण लेकर
यतन्ति
प्रयत्न करते हैं
ये
जो
ते
वे
ब्रह्म
ब्रह्म को
तत्
उसे
विदुः
जानते हैं
कृत्स्नम्
पूरा
अध्यात्मम्
अध्यात्म को
कर्म च
और कर्म को
अखिलम्
समूचा

कृष्ण कहते हैं — जो लोग बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्ति के लिए मेरी शरण लेकर प्रयत्न करते हैं, वे ब्रह्म को, अध्यात्म को और समस्त कर्म को जान लेते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु — ये हर इंसान के जीवन की सच्चाई हैं। जो इनसे घबराता नहीं, बल्कि इन्हें देखकर परमात्मा की ओर मुड़ता है — वही सच्चा साधक है। जैसे दीपक की रोशनी में सब कुछ दिखाई देता है — कृष्ण के आश्रय में ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म — सब स्पष्ट होता है।

यह श्लोक 7.28 के बाद का अगला कदम है — द्वंद्व-मुक्त भक्त क्या जानता है? ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म — तीनों।

7.29 और 7.30 एक जोड़ी है जो अध्याय 7 को समाप्त करती है। 'ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म' और अगले श्लोक में 'अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ' — यह आठवें अध्याय के विषयों की प्रस्तावना है।

केनोपनिषद् कहता है — 'इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति' — यदि यहीं जान लिया तो सत्य है। गीता का 'ते ब्रह्म तद्विदुः' उसी परंपरा में है।

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