7.27 में कहा — द्वंद्व-मोह से सब जन्म लेते ही भटक जाते हैं। यहाँ उपाय है — जिनके पाप समाप्त हो गए हैं, जो पुण्य कर्म करते रहे हैं, वे इस द्वंद्व-मोह से मुक्त होकर दृढ़ व्रत से मुझे भजते हैं।
यह एक आशा का श्लोक है। जैसे जमी हुई मिट्टी में पानी डालते-डालते एक दिन बीज अंकुरित होता है — वैसे ही पुण्य कर्मों से धीरे-धीरे द्वंद्व-मोह कम होता है और परमात्मा की ओर मन लगने लगता है।
'दृढव्रताः' — दृढ़ व्रत। जो एक बार तय कर लेते हैं, वे डगमगाते नहीं।