📿 श्लोक संग्रह

अन्तवत्तु फलं तेषाम्

गीता 7.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥
अन्तवत्
अंत वाला, सीमित
तु
लेकिन
फलम्
फल
तेषाम्
उनका
तत्
वह
भवति
होता है
अल्पमेधसाम्
अल्पबुद्धि वालों का
देवान्
देवताओं को
देवयजः
देवताओं को पूजने वाले
यान्ति
जाते हैं
मद्भक्ताः
मेरे भक्त
यान्ति
जाते हैं
माम् अपि
मुझको भी

कृष्ण कहते हैं — देवता-उपासकों को फल मिलता है, लेकिन वह फल सीमित है। जो देवताओं को पूजते हैं वे देवताओं के लोक को जाते हैं। और मेरे भक्त मुझे आते हैं।

'अल्पमेधसाम्' शब्द कठोर नहीं है। इसका अर्थ है — जो दूर का नहीं सोचता, केवल तत्काल फल के लिए पूजता है। जैसे एक बच्चा केवल आज की मिठाई के लिए काम करे, दूसरा दीर्घकालीन लक्ष्य के लिए।

यह श्लोक किसी देवता की निंदा नहीं करता। यह गंतव्य का अंतर बताता है — सीमित और असीमित।

7.23 के बाद अध्याय का ध्यान बदलता है — 7.24 से 7.30 तक कृष्ण अपने अव्यक्त स्वरूप और माया के पर्दे की बात करेंगे। 7.23 उस भाग की भूमिका है।

भागवत पुराण में भी कहा गया है कि देवलोक भी अनित्य हैं — पुण्य समाप्त होने पर वापसी होती है। गीता का 'अन्तवत्' इसी अनित्यता का संकेत है।

अध्याय 7 · 23 / 30
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