📿 श्लोक संग्रह

स तया श्रद्धया युक्तः

गीता 7.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥
सः
वह
तया श्रद्धया
उस श्रद्धा से
युक्तः
युक्त
तस्य
उस देवता की
आराधनम्
आराधना
ईहते
करता है
लभते च
और पाता है
ततः
उससे
कामान्
मनोरथों को
मया एव
मेरे ही द्वारा
विहितान्
दिए गए
हि तान्
वे ही

7.21 में कृष्ण ने कहा — मैं श्रद्धा दृढ़ करता हूँ। यहाँ वे कहते हैं — और उस श्रद्धा से वह भक्त जो फल पाता है, वह भी मेरे ही द्वारा दिया गया है।

यानी देवता-उपासक जब फल पाते हैं, तो उस फल का वास्तविक स्रोत भी परमात्मा ही है। जैसे बिजली के कई बल्ब होते हैं — हर बल्ब अलग दिखता है, लेकिन सबमें वही एक बिजली है।

यह श्लोक किसी भी उपासना को व्यर्थ नहीं कहता। वह फल मिलता है। लेकिन अगला श्लोक (7.23) बताएगा — वह फल सीमित है।

7.21-7.22-7.23 एक तीन-श्लोक इकाई है — श्रद्धा दृढ़ होती है, फल मिलता है, लेकिन फल सीमित है। यह भक्ति की गहराई और उसके गंतव्य का विवेचन है।

विष्णु पुराण में भी कहा गया है कि परमात्मा सभी देवताओं में अंतर्यामी रूप से विद्यमान है। गीता का 'मयैव विहितान्' उसी अंतर्यामित्व का कथन है।

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