7.21 में कृष्ण ने कहा — मैं श्रद्धा दृढ़ करता हूँ। यहाँ वे कहते हैं — और उस श्रद्धा से वह भक्त जो फल पाता है, वह भी मेरे ही द्वारा दिया गया है।
यानी देवता-उपासक जब फल पाते हैं, तो उस फल का वास्तविक स्रोत भी परमात्मा ही है। जैसे बिजली के कई बल्ब होते हैं — हर बल्ब अलग दिखता है, लेकिन सबमें वही एक बिजली है।
यह श्लोक किसी भी उपासना को व्यर्थ नहीं कहता। वह फल मिलता है। लेकिन अगला श्लोक (7.23) बताएगा — वह फल सीमित है।