📿 श्लोक संग्रह

यो यो यां यां तनुम्

गीता 7.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥
यः यः
जो जो
याम् याम्
जिस जिस
तनुम्
रूप को, देवता-रूप को
भक्तः
भक्त
श्रद्धया
श्रद्धा से
अर्चितुम्
पूजा करने को
इच्छति
चाहता है
तस्य तस्य
उस उस की
अचलाम्
अचल, स्थिर
श्रद्धाम्
श्रद्धा को
ताम् एव
उसी को
विदधामि
दृढ़ करता हूँ
अहम्
मैं

यह श्लोक बहुत उदार है। कृष्ण कहते हैं — जो भक्त जिस भी देवता के रूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस भक्त की उस देवता के प्रति श्रद्धा को मैं स्वयं दृढ़ करता हूँ।

यानी परमात्मा किसी की श्रद्धा को कमज़ोर नहीं करता — चाहे वह किसी भी रूप की पूजा करे। जैसे एक दादा अपने पोते के किसी भी अच्छे प्रयास को प्रोत्साहित करते हैं।

यह श्लोक बताता है कि भक्ति का मूल श्रद्धा है। जहाँ सच्ची श्रद्धा है, वहाँ परमात्मा की शक्ति काम करती है।

7.21 और 7.22 एक जोड़ी है — 7.21 में श्रद्धा दृढ़ करने की बात, 7.22 में उस पूजा का फल मिलने की। दोनों मिलकर बताते हैं कि कोई भी उपासना व्यर्थ नहीं जाती।

ऋग्वेद के 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' (1.164.46) — एक ही सत्य को विद्वान अनेक रूपों में कहते हैं — गीता का यह उदार दृष्टिकोण उसी वैदिक परंपरा में है।

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