📿 श्लोक संग्रह

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः

गीता 7.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥
कामैः
कामनाओं से
तैस्तैः
विविध प्रकार की
हृतज्ञानाः
जिनका ज्ञान हर लिया गया
प्रपद्यन्ते
शरण लेते हैं
अन्यदेवताः
अन्य देवताओं की
तम् तम्
उस-उस प्रकार का
नियमम्
नियम, व्रत
आस्थाय
अपनाकर
प्रकृत्या
अपनी प्रकृति से
नियताः
नियंत्रित
स्वया
अपनी

7.19 में ज्ञानी की बात थी जो 'वासुदेवः सर्वम्' जान लेता है। यहाँ उनकी बात है जिनकी कामनाओं ने ज्ञान ढँक लिया है। ऐसे लोग अपनी-अपनी इच्छाओं के अनुसार अलग-अलग देवताओं की उपासना करते हैं।

यह कोई निंदा नहीं है। जैसे बाज़ार में जाने वाले अलग-अलग दुकानों में जाते हैं अपनी जरूरत के अनुसार — वैसे ही लोग अपनी प्रकृति और कामना के अनुसार मार्ग चुनते हैं।

कृष्ण यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जो बिना किसी विशेष कामना के मेरे पास आता है वह ज्ञानी है। और जो कामना-वश किसी देवता के पास जाता है — उसकी अपनी यात्रा है।

7.20-7.23 एक समूह है जो बताता है कि विभिन्न उपासनाएँ कहाँ ले जाती हैं। 7.23 में कृष्ण कहेंगे कि देवता-उपासक देवताओं को पाते हैं, मेरे भक्त मुझे। यह श्रेणीकरण नहीं — यात्रा के गंतव्य का वर्णन है।

गीता यहाँ किसी देवता की निंदा नहीं करती। विभिन्न उपास्य देवता भी परमात्मा की शक्तियाँ हैं — यही 7.12 में कहा था।

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