📿 श्लोक संग्रह

बहूनां जन्मनामन्ते

गीता 7.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥
बहूनाम्
बहुत से
जन्मनाम्
जन्मों के
अन्ते
अंत में
ज्ञानवान्
ज्ञान से संपन्न
माम्
मुझको
प्रपद्यते
शरण लेता है
वासुदेवः
वासुदेव (कृष्ण)
सर्वम् इति
सब कुछ है — ऐसा जानकर
सः
वह
महात्मा
महान आत्मा
सुदुर्लभः
बड़ा दुर्लभ

यह गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है। कृष्ण कहते हैं — अनेक जन्मों की साधना के अंत में जब ज्ञान परिपक्व हो जाता है, तब व्यक्ति जान लेता है कि वासुदेव ही सब कुछ है।

'वासुदेवः सर्वम्' — यह तीन शब्दों में पूरे अध्याय का सार है। जब यह बोध होता है कि हर जगह, हर रूप में, हर क्षण — वही एक है — तब यात्रा पूरी होती है।

और ऐसा महात्मा बहुत दुर्लभ है। यह 7.3 की बात फिर आती है — हजारों में एक। लेकिन यहाँ वह यात्रा पूरी हो चुकी है।

'वासुदेवः सर्वम्' — यह वेदान्त की सर्वोच्च अनुभूति का कथन है। माण्डूक्योपनिषद् का 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्म' और छांदोग्य उपनिषद् का 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इसी भाव के समकक्ष हैं।

गीता 7.19 यह भी बताती है कि यह बोध जल्दी नहीं आता — 'बहूनां जन्मनाम् अन्ते'। यह धीरज की शिक्षा है। साधना लंबी है, लेकिन जब फल आता है तो पूरा आता है।

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