कृष्ण यहाँ बड़ी करुणा से कहते हैं — ये सभी चारों भक्त उदार हैं, श्रेष्ठ हैं। कोई छोटा नहीं। लेकिन ज्ञानी के बारे में मेरा मत यह है कि वह तो मेरा स्वरूप ही है।
यह एक अद्भुत बात है। भगवान ज्ञानी को अपना स्वरूप कह रहे हैं। जैसे सूर्य और उसकी रोशनी — रोशनी सूर्य से अलग नहीं है। ज्ञानी और परमात्मा के बीच वह दूरी मिट जाती है।
'मामेवानुत्तमां गतिम्' — वह सर्वोत्तम लक्ष्य के रूप में केवल मुझमें स्थित है। यह भक्ति की पूर्णावस्था है।