कृष्ण एक गहरी बात कहते हैं — जो नहीं समझते वे सोचते हैं कि मैं पहले अव्यक्त था और अब व्यक्त (मानव रूप में) हो गया। लेकिन वे मेरे परम, अविनाशी, सर्वोत्तम स्वरूप को नहीं जानते।
जैसे आकाश हमेशा था — बादल आते-जाते हैं, लेकिन आकाश नहीं बदलता। वैसे ही कृष्ण का मानव रूप एक प्रकाश है, लेकिन उसके पीछे का परम स्वरूप अनादि, अनंत और अव्यय है।
यह श्लोक विनम्रता से जिज्ञासा जगाता है — क्या हम कृष्ण को केवल उनके दृश्य रूप में देखते हैं, या उनके परम स्वरूप को पहचानने की कोशिश करते हैं?