📿 श्लोक संग्रह

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नम्

गीता 7.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥
अव्यक्तम्
अव्यक्त (अप्रकट)
व्यक्तिम् आपन्नम्
व्यक्त (प्रकट) हुआ
मन्यन्ते
मानते हैं
माम्
मुझको
अबुद्धयः
अबुद्धि वाले
परम्
परम, सर्वोच्च
भावम्
स्वरूप
अजानन्तः
न जानते हुए
मम
मेरे
अव्ययम्
अविनाशी
अनुत्तमम्
सर्वोत्तम

कृष्ण एक गहरी बात कहते हैं — जो नहीं समझते वे सोचते हैं कि मैं पहले अव्यक्त था और अब व्यक्त (मानव रूप में) हो गया। लेकिन वे मेरे परम, अविनाशी, सर्वोत्तम स्वरूप को नहीं जानते।

जैसे आकाश हमेशा था — बादल आते-जाते हैं, लेकिन आकाश नहीं बदलता। वैसे ही कृष्ण का मानव रूप एक प्रकाश है, लेकिन उसके पीछे का परम स्वरूप अनादि, अनंत और अव्यय है।

यह श्लोक विनम्रता से जिज्ञासा जगाता है — क्या हम कृष्ण को केवल उनके दृश्य रूप में देखते हैं, या उनके परम स्वरूप को पहचानने की कोशिश करते हैं?

7.24-7.25 मिलकर एक विचार देते हैं — मेरा परम स्वरूप सबको दिखाई नहीं देता, माया के पर्दे के कारण। यह 7.13-7.14 (माया का मोह) की बात को और गहरा करता है।

केनोपनिषद् में कहा गया है — 'यन्मनसा न मनुते' — जो मन से नहीं सोचा जा सकता। कृष्ण का 'परं भावमनुत्तमम्' उसी अगम्य परमतत्व का वर्णन है।

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