📿 श्लोक संग्रह

नाहं प्रकाशः सर्वस्य

गीता 7.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥
न अहम्
मैं नहीं
प्रकाशः
प्रकट
सर्वस्य
सबके लिए
योगमाया समावृतः
योगमाया से ढँका हुआ
मूढः
मोहित, भ्रमित
अयम्
यह
न अभिजानाति
नहीं जानता
लोकः
जगत
माम्
मुझको
अजम्
अजन्मा
अव्ययम्
अविनाशी

कृष्ण कहते हैं — मैं सबको प्रकट नहीं होता। मेरी योगमाया मुझे ढँके रहती है। इसीलिए यह मोहित जगत मेरे अजन्मे, अविनाशी स्वरूप को नहीं पहचान पाता।

जैसे बादलों में ढँका सूर्य — सूर्य तो है, लेकिन बादल के कारण सीधे नहीं दिखता। योगमाया वह बादल है। लेकिन यह बादल भी उसी सूर्य की शक्ति से बना है।

यहाँ 'योगमाया' और 7.14 की 'दैवी माया' में फर्क है — योगमाया परमात्मा की रहस्यमय शक्ति है जो उन्हें ढँकती है। यह जड़ माया से अलग है।

7.24 और 7.25 मिलकर बताते हैं — मेरा परम स्वरूप सामान्य दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। 'योगमाया' शब्द भागवत पुराण में भी आता है — विशेषकर जन्माष्टमी के प्रसंग में।

मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है — 'न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा' — आँखों से नहीं देखा जा सकता, वाणी से नहीं पकड़ा जा सकता। गीता का 'योगमायासमावृतः' उसी भाव को सरल भाषा में रखता है।

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