📿 श्लोक संग्रह

वेदाहं समतीतानि

गीता 7.26 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥
वेद
जानता हूँ
अहम्
मैं
समतीतानि
बीते हुए (भूत)
वर्तमानानि च
और वर्तमान
अर्जुन
हे अर्जुन
भविष्याणि च
और भविष्य
भूतानि
प्राणियों को
माम् तु
लेकिन मुझको
वेद
जानता है
न कश्चन
कोई नहीं

कृष्ण कहते हैं — मैं सभी प्राणियों के भूत, वर्तमान और भविष्य को जानता हूँ। लेकिन मुझे कोई नहीं जानता।

जैसे एक किसान अपने खेत की हर मिट्टी को जानता है, लेकिन मिट्टी किसान को नहीं जान सकती। परमात्मा सबको जानता है, लेकिन वह स्वयं ज्ञान के विषय के रूप में किसी की पकड़ में नहीं आता।

यह श्लोक 7.25 की बात को आगे ले जाता है — माया के कारण जगत उन्हें नहीं जानता। और 7.27 में कारण आएगा — द्वंद्व-मोह।

7.26 परमात्मा की सर्वज्ञता और जगत की अज्ञता का एक साथ कथन है। यह 7.3 ('मनुष्याणां सहस्रेषु') की बात को और गहरा करता है।

बृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य कहते हैं — 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' — जो जानने वाला है, उसे कौन जाने? गीता का 'मां तु वेद न कश्चन' उसी उपनिषद्-सत्य का कथन है।

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