कृष्ण कहते हैं — चारों में ज्ञानी श्रेष्ठ है। ज्ञानी वह है जो सदा मुझमें लगा रहता है, एकनिष्ठ भाव से। वह मुझे अत्यंत प्रिय है — और मैं भी उसे अत्यंत प्रिय हूँ।
यह दोनों तरफ का प्रेम है — 'प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थम् अहम्, स च मम प्रियः'। जैसे दादा-पोते का रिश्ता — पोते को दादा प्रिय और दादा को पोता। यह एकतरफा नहीं।
बाकी तीन भक्त — आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी — कम मूल्यवान नहीं। लेकिन ज्ञानी की एकनिष्ठता उसे विशेष बनाती है।