📿 श्लोक संग्रह

चतुर्विधा भजन्ते माम्

गीता 7.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥
चतुर्विधाः
चार प्रकार के
भजन्ते
भजते हैं
माम्
मुझको
जनाः
लोग
सुकृतिनः
पुण्यात्मा
अर्जुन
हे अर्जुन
आर्तः
दुःखी, पीड़ित
जिज्ञासुः
जानने की इच्छा रखने वाला
अर्थार्थी
धन-फल की इच्छा रखने वाला
ज्ञानी च
और ज्ञानी
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ

कृष्ण कहते हैं — चार प्रकार के पुण्यात्मा मेरी भक्ति करते हैं। पहला — आर्त (जो दुःख में है)। दूसरा — जिज्ञासु (जो जानना चाहता है)। तीसरा — अर्थार्थी (जो कुछ पाना चाहता है)। और चौथा — ज्ञानी।

यह श्लोक बहुत उदार है। कृष्ण यह नहीं कहते कि केवल ज्ञानी ही मेरे पास आएँ। दुःख में रोने वाला भी, जिज्ञासा से पूछने वाला बच्चा भी, कुछ माँगने वाला भी — सब मेरे पास आते हैं।

जैसे दादा की गोद में कोई रोते हुए आता है, कोई सवाल लेकर, कोई कुछ माँगने — दादा सबको स्वीकार करते हैं। परमात्मा भी ऐसा ही है।

यह श्लोक भक्ति के द्वार सबके लिए खुले रखता है। अगले श्लोक 7.17 में कृष्ण बताएँगे कि ज्ञानी सबसे प्रिय क्यों है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बाकी तीन कम मूल्यवान हैं।

भागवत पुराण में नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन है। गीता का यह चतुर्विध वर्गीकरण भक्त के उद्देश्य पर आधारित है — दुःख-निवारण, जिज्ञासा, अर्थ-प्राप्ति, और शुद्ध ज्ञान।

अध्याय 7 · 16 / 30
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