📿 श्लोक संग्रह

मय्यासक्तमनाः पार्थ

गीता 7.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥
मयि
मुझमें
आसक्तमनाः
आसक्त मन वाला
पार्थ
हे पार्थ (अर्जुन)
योगम्
योग को
युञ्जन्
लगाते हुए
मदाश्रयः
मेरे आश्रय में
असंशयम्
बिना संशय के
समग्रम्
पूरी तरह
माम्
मुझको
यथा
जिस प्रकार
ज्ञास्यसि
जानेगा
तत्
वह
शृणु
सुन

भगवान कृष्ण यहाँ अर्जुन से कह रहे हैं — बेटा, अपना मन मुझमें लगा और मेरे आश्रय में आ जा। जैसे एक बच्चा दादा-दादी की गोद में बैठकर कहानी सुनता है — बिना किसी शक के, पूरे भरोसे के साथ — वैसे ही तू मेरी शरण में आ।

'असंशयं समग्रम्' — यानी पूरी तरह, बिना एक भी संशय के। जो मन बिना शक के लग जाता है, वह मुझे पूरा जान लेता है। आधे मन से की गई पढ़ाई कभी पूरी नहीं होती।

यह श्लोक सातवें अध्याय का पहला श्लोक है। यहाँ कृष्ण वादा करते हैं — तू बस मेरी शरण में आ, मैं तुझे सब बताऊँगा। शिष्य में श्रद्धा और गुरु में आश्रय — यही ज्ञान का द्वार है।

यह गीता के सातवें अध्याय ज्ञानविज्ञानयोग का आरंभ है। 'मदाश्रयः' शब्द महत्वपूर्ण है — केवल बौद्धिक जिज्ञासा नहीं, आत्मसमर्पण की बात है। इस अध्याय में कृष्ण ज्ञान (सैद्धांतिक) और विज्ञान (अनुभव) दोनों की बात करेंगे।

मुण्डकोपनिषद् में भी कहा गया है कि श्रद्धापूर्वक गुरु के पास जाकर पूछने पर ही ब्रह्मज्ञान मिलता है। 'शृणु' (सुन) कहकर कृष्ण शिष्यभाव की माँग करते हैं — यही परंपरा है।

अध्याय 7 · 1 / 30
अध्याय 7 · 1 / 30 अगला →