📿 श्लोक संग्रह

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम्

गीता 7.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥
ज्ञानम्
ज्ञान (सैद्धांतिक बोध)
ते
तेरे लिए
अहम्
मैं
सविज्ञानम्
विज्ञान सहित (अनुभव-ज्ञान सहित)
इदम्
यह
वक्ष्यामि
बताऊँगा
अशेषतः
पूरी तरह, बिना शेष छोड़े
यत्
जिसे
ज्ञात्वा
जानकर
नहीं
इह
इस संसार में
भूयः
फिर और
अन्यत्
कुछ और
ज्ञातव्यम्
जानने योग्य
अवशिष्यते
शेष रहता है

कृष्ण कह रहे हैं — मैं तुझे ज्ञान और विज्ञान दोनों बताऊँगा। ज्ञान यानी शास्त्र की बात, और विज्ञान यानी उसे भीतर से जीकर समझना। जैसे किसान खेती की किताब पढ़े वह ज्ञान है, और खुद मिट्टी में हाथ डालकर समझे वह विज्ञान।

सबसे बड़ी बात — जिसे जानने के बाद कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता। एक ही मिट्टी जान लो तो सारे मिट्टी के बर्तन जाने हुए। एक ही सोने को जान लो तो सारे गहने जाने हुए। वह एक परम ज्ञान यही परमात्मा का ज्ञान है।

'अशेषतः' — बिना शेष छोड़े। यह गुरु की प्रतिज्ञा जैसा है। कृष्ण वादा कर रहे हैं कि कुछ भी नहीं छुपाऊँगा।

7.1 में कृष्ण ने अर्जुन को तैयार किया, 7.2 में अपना वचन रखते हैं। 'ज्ञान' और 'विज्ञान' का यह भेद भारतीय दर्शन में महत्वपूर्ण है — शास्त्रीय बोध और आत्मानुभव दोनों की जरूरत होती है।

मुण्डकोपनिषद् (1.1.3) में भी दो प्रकार की विद्या बताई गई है — परा और अपरा। 'यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यत्' की भावना कठोपनिषद् में भी मिलती है जहाँ नचिकेता उस एक ज्ञान की माँग करता है।

अध्याय 7 · 2 / 30
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