📿 श्लोक संग्रह

सुहृन्मित्रार्युदासीन

गीता 6.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥
सुहृत्
शुभचिंतक
मित्र
मित्र
अरि
शत्रु
उदासीन
तटस्थ — न मित्र न शत्रु
मध्यस्थ
बीच में रहने वाला
द्वेष्य
द्वेष करने वाला
समबुद्धिः विशिष्यते
समबुद्धि वाला विशिष्ट है

कृष्ण यहाँ सात प्रकार के लोगों की सूची देते हैं — शुभचिंतक, मित्र, शत्रु, तटस्थ, बीच का, द्वेष करने वाला, बंधु। इन सबमें जो समान भाव रखे — अच्छे लोगों में भी, बुरे लोगों में भी — वही विशिष्ट योगी है।

यह बड़ी कठिन बात है। हम स्वाभाविक रूप से मित्र से प्रेम करते हैं और शत्रु से दूर रहते हैं। लेकिन कृष्ण कह रहे हैं — जब बुद्धि इस भेद से ऊपर उठ जाए, तब वह समबुद्धि बन जाती है। यही विशेषता है।

यह श्लोक 6.7 और 6.8 की श्रृंखला में है — जितात्मा की पहचान के लक्षण। सम दृष्टि — समान दृष्टि — गीता का एक मुख्य आदर्श है।

दूसरे अध्याय में भी 'स्थितप्रज्ञ' का वर्णन इसी प्रकार किया गया था — जो न हर्ष से उत्तेजित हो, न दुख से व्याकुल। 6.9 उसी स्थितप्रज्ञ का सामाजिक रूप है।

अध्याय 6 · 9 / 47
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